Jen z Rajasthan
Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Jen z Rajasthan, Health/Beauty, plot no 22 and 25 shubhan colony behind secret heart school kayar Ajmer, Ajmer.
16/09/2026
16/09/2026
UCC पर विपक्ष का चौतरफा वार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर दिए बयान के बाद सियासत में नई हलचल शुरू हो गई है. उन्होंने रविवार को मुंबई में कहा था कि 2029 से पहले बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के सभी 21 राज्यों में UCC लागू हो जाएगा. इस बयान के बाद से अलग-अलग दलों की प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई हैं. इधर, उत्तर प्रदेश में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने गृहमंत्री अमित शाह के बयान के बाद अपनी प्रतिक्रिया दी है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर अपनी बात रखी है. उन्होंने एक ओर जहां यूसीसी का नया फुलफॉर्म बताया तो वहीं बीजेपी पर हमला बोलते हुए लिखा कि, 'जनता समझ रही है भाजपा जिस यूसीसी की बात कर रही है दरअसल उसकी Full Form कुछ और है, UCC = Underground Communal Conspiracy.' इसके बाद अखिलेश यादव ने स्लोगन अंदाज में एक कविता भी लिखी है. उन्होंने कहा कि सरकार को UCC लाने से पहले अपने पुराने वादे पूरे करने चाहिए. अखिलेश ने लिखा, 'पहले पिछले वादे निभाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ.' उन्होंने 15 लाख रुपये खाते में पहुंचाने, दो करोड़ नौकरियां देने, युवाओं को रोजगार दिलाने, स्कूलों को बंद होने से बचाने और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों को उठाते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा.
ओवैसी ने बताया संविधान के खिलाफ
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी UCC का विरोध किया है. भोपाल में उन्होंने कहा कि ऐसा कानून संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 14 और 29 के खिलाफ है. ओवैसी ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता को समाप्त करके इस तरह का कानून लागू नहीं किया जा सकता.
यूपी में जल्द लागू हो सकता है UCC- भूपेंद्र चौधरी
उधर, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने बड़ा बयान दिया है. आजतक से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि UCC बीजेपी के घोषणा पत्र और संकल्प पत्र का हिस्सा है और उत्तर प्रदेश में भी इसे जल्द लागू किया जा सकता है. भूपेंद्र चौधरी ने कहा, 'समान आचार संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड हमारे घोषणा पत्र और संकल्प पत्र का हिस्सा है. यह हमारा कमिटमेंट है. जैसा गृह मंत्री अमित शाह जी ने कहा है कि इसे लागू करेंगे, तो हमें उम्मीद है कि हमारी सरकार भी ऐसा करेगी.' अमित शाह के बयान पर उन्होंने कहा, 'मैं इतना कह सकता हूं कि उन्होंने जो बयान दिया है, वह हमारी पॉलिसी का हिस्सा है और जल्द ही यूपी में भी UCC लागू हो सकता है.'
'मुख्यमंत्री योगी जरूर कोई फैसला लेंगे'
उत्तर प्रदेश में UCC लागू करने को लेकर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष और सरकार में मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने आगे कहा, 'मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी जरूर इस बारे में कोई न कोई फैसला लेंगे.'सविपक्ष की आपत्तियों पर उन्होंने कहा कि बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में किए गए वादों को पूरा किया है. उन्होंने कहा, 'विपक्ष चाहे जो कहे, लेकिन हमने अभी तक अपने संकल्प पत्र में जो-जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा किया है. UCC भी हमारे संकल्प पत्र का हिस्सा है, इसलिए हम इसे भी पूरा करेंगे.'
🌺 हाँ… भगवान है!
नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट की सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय से निकले विचार
कभी-कभी जीवन हमें ऐसे अनुभव दे जाता है, जिनके सामने बड़े-बड़े तर्क भी मौन हो जाते हैं। हिमालय की बर्फीली वादियों में घटी एक मार्मिक घटना शायद हमें यही समझाती है कि भगवान को केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी करुणा और सेवा के भाव में भी खोजा जाना चाहिए।
एक मेजर के नेतृत्व में 15 जवान कड़ाके की ठंड में हिमालय के दुर्गम रास्ते से गुजर रहे थे। थकान और भूख से परेशान जवानों को एक बंद चाय की दुकान दिखाई दी। मजबूरी में ताला तोड़कर उन्होंने चाय बनाई, कुछ बिस्किट खाए और आगे बढ़ गए। लेकिन मेजर के मन में उस ताले को तोड़ने की ग्लानि थी। उन्होंने दुकान के मालिक के लिए चीनी के डिब्बे के नीचे ₹1000 रख दिए और चले गए।
तीन महीने बाद जब वही जवान लौटे तो दुकान खुली मिली। वृद्ध चायवाले से बातचीत में पता चला कि उसका इकलौता बेटा आतंकवादियों की मार से घायल था और उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। उस रात उसने भगवान से रोकर सहायता मांगी थी।
सुबह जब उसने दुकान का टूटा ताला देखा तो उसे लगा कि उसकी बची-खुची पूंजी भी चोरी हो गई। लेकिन दुकान के भीतर चीनी के डिब्बे के नीचे उसे ₹1000 का वही नोट मिला।
वृद्ध की आंखों में विश्वास था—“साहब, भगवान हैं… मैंने देखा है। उस रात मेरी प्रार्थना भगवान ने सुन ली थी।”
पंद्रहों जवानों की निगाहें मेजर की ओर उठीं। मेजर ने केवल आंखों से उन्हें चुप रहने का संकेत दिया। फिर वृद्ध को गले लगाकर कहा—“हाँ बाबा, मैं जानता हूँ… भगवान हैं।”
शायद उस क्षण मेजर के मन में यह विचार भी आया होगा कि उसने तो केवल एक छोटी-सी गलती का प्रायश्चित किया था, लेकिन किसी जरूरतमंद के लिए वही ₹1000 भगवान के उत्तर में बदल गए।
यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
हम अक्सर पूछते हैं—“भगवान कहाँ हैं?”
शायद उत्तर यह है कि जब किसी भूखे को भोजन मिलता है, किसी निराश व्यक्ति को सहारा मिलता है, किसी गरीब की दवा का इंतजाम होता है, किसी रोते हुए व्यक्ति के आंसू पोंछे जाते हैं और किसी टूटे हुए मन में फिर से उम्मीद जगती है—वहीं भगवान अपनी उपस्थिति का अनुभव कराते हैं।
इसलिए सेवा करते समय यह मत सोचिए कि आप किसी पर उपकार कर रहे हैं। हो सकता है, आपकी सहायता वास्तव में किसी की प्रार्थना का उत्तर हो।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—भगवान हमेशा चमत्कार करके हमारे सामने नहीं आते। कभी वे किसी डॉक्टर के हाथ बनते हैं, कभी किसी सैनिक के साहस में दिखाई देते हैं, कभी किसी अनजान व्यक्ति की मदद में और कभी हमारी अपनी करुणा में।
किसी के जीवन में उम्मीद बन जाना भी पूजा है।
किसी के आंसू पोंछ देना भी प्रार्थना है।
और किसी जरूरतमंद के काम आ जाना भी भगवान की सेवा है।
इसलिए जीवन में जब भी किसी जरूरतमंद को देखें, यह मत पूछिए कि “मेरे लिए इसमें क्या है?”
एक बार यह पूछकर देखिए—“शायद भगवान ने मुझे इसके लिए माध्यम बनाकर भेजा है।”
क्योंकि हमें यह कभी पता नहीं होता कि हमारी छोटी-सी मदद किसी दूसरे इंसान के जीवन में कितनी बड़ी आशा बन जाएगी।
🌺 शायद भगवान को देखने के लिए आंखें बंद करने से पहले हमें अपना हृदय खोलना सीखना होगा।
हाँ… भगवान है।
वह हमारे भीतर भी है और उस क्षण भी है, जब हम किसी दूसरे के दुःख में उसके साथ खड़े होते हैं।
— श्रीमती सीमा पाराशर
सचिव, नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट, अजमेर
15/09/2026
राजा निमि से माता सीता तक — जीवन का मंथन
नीरजा फाउंडेशन, शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर
सचिव श्रीमती सीमा पाराशर
राजा निमि सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु के पुत्र और धर्मपरायण, प्रजाहितकारी राजा थे। उन्होंने महान यज्ञ का संकल्प लिया और कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ को यज्ञ का ऋत्विज् बनने के लिए आमंत्रित किया। वसिष्ठ के इंद्र के यज्ञ में व्यस्त होने के कारण निमि ने जीवन की क्षणभंगुरता को देखते हुए अन्य ऋषियों के साथ यज्ञ प्रारंभ कर दिया। लौटने पर वसिष्ठ और निमि के बीच क्रोधवश ऐसा विवाद हुआ कि दोनों ने एक-दूसरे को देह त्याग का शाप दे दिया।
यज्ञ पूर्ण होने के बाद देवताओं ने निमि को पुनः शरीर धारण करने का अवसर दिया, लेकिन उन्होंने नश्वर देह को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। यही उनका सबसे अद्भुत त्याग माना गया। आगे ऋषियों ने उनके शरीर का मंथन किया, जिससे मिथिल का जन्म हुआ और उसी वंश में आगे चलकर राजा जनक और माता सीता का प्राकट्य हुआ।
यहीं से राजा निमि की कथा केवल पुराण की घटना नहीं रहती, बल्कि आज के मनुष्य के लिए जीवन-दर्शन बन जाती है—
1. अनित्यता का बोध और कर्तव्य
जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए अच्छे काम, सेवा, प्रेम और अपने लोगों को समय देने के लिए ‘कल’ की प्रतीक्षा न करें। जो कहना है, प्रेम से आज कहें; जो करना है, शुभ आज करें।
2. अहंकार नहीं, संवाद
निमि-वसिष्ठ प्रसंग बताता है कि क्षणिक क्रोध वर्षों के संबंधों पर भारी पड़ सकता है। आज परिवार और समाज में मतभेद से अधिक नुकसान संवादहीनता करती है। अनुमान नहीं, बातचीत; जीत नहीं, संबंध बचाइए।
3. देह नहीं, चरित्र पहचान है
निमि ने नश्वर शरीर को ठुकराया। आज मनुष्य भी बाहरी रूप, धन, पद और प्रतिष्ठा में अपनी पहचान खोजता है। जबकि वास्तविक पहचान विचार, संस्कार और कर्म से बनती है।
4. मंथन से नव-सृजन
निमि के शरीर के मंथन से नई वंश-परंपरा जन्मी। जीवन में भी संकट, असफलता और टूटन को अंतिम सत्य न मानें। परिस्थितियों का मंथन अनुभव देता है और अनुभव नई दिशा।
5. गृहस्थ में वैराग्य
जनक परंपरा सिखाती है कि वैराग्य संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए आसक्ति पर नियंत्रण है। परिवार की जिम्मेदारी निभाएँ, लेकिन अपनों को अपनी संपत्ति न समझें; प्रेम में अधिकार से अधिक विश्वास रखें।
6. सीता का संदेश—श्रम, नारी और प्रकृति का सम्मान
राजा जनक का स्वयं हल चलाना श्रम की गरिमा सिखाता है और धरती से सीता का प्राकट्य नारी तथा प्रकृति के सम्मान का संदेश देता है। जिस समाज में बेटी का सम्मान, श्रम का आदर और प्रकृति की रक्षा होती है, वही समाज वास्तव में समृद्ध होता है।
🌸 सचिव श्रीमती सीमा पाराशर का हृदयस्पर्शी संदेश
“राजा निमि की कथा मुझे यह सोचने पर विवश करती है कि हम अपने जीवन के बाद क्या छोड़कर जाना चाहते हैं। धन-संपत्ति एक दिन किसी और की हो जाएगी, लेकिन हमारे प्रेम, व्यवहार, संस्कार और अच्छे कर्म लोगों के जीवन में जीवित रह सकते हैं। इसलिए इतना ही न कमाएँ कि हमारे पास बहुत कुछ हो जाए, बल्कि इतना अच्छा भी बनें कि हमारे जाने के बाद लोग हमारी संपत्ति नहीं, हमारे संस्कारों को याद करें। किसी के लिए सहारा बनें, किसी टूटे रिश्ते में संवाद बनें और किसी बच्चे के जीवन में सही दिशा बनें—शायद यही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।”
राजा निमि ने देह छोड़ी, लेकिन उनकी विरासत चलती रही। जनक का युग बीत गया, लेकिन उनका आदर्श जीवित रहा और उसी परंपरा में माता सीता का प्राकट्य हुआ।
शरीर मिट जाता है, धन बँट जाता है, पद छूट जाता है—लेकिन प्रेम से दिया संस्कार, सही समय पर दिया सहारा और किया गया अच्छा कर्म पीढ़ियों तक जीवित रह सकता है।
इसलिए जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं; अपने बाद भी दूसरों के जीवन में प्रकाश छोड़ जाने का नाम है।
— नीरजा फाउंडेशन
सचिव श्रीमती सीमा पाराशर
14/09/2026
अमृत कलश
एमबीबीएस का सपना : भविष्य का निवेश या आर्थिक जंजीर?
नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट की सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय से निकले विचार
आज हर माता-पिता अपने बच्चे को सफल और सुरक्षित भविष्य देना चाहता है। डॉक्टर बनना आज भी हमारे समाज में सम्मान, प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि अनेक माता-पिता सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिलने पर निजी मेडिकल कॉलेजों में करोड़ों रुपये खर्च करने को तैयार हो जाते हैं और कई परिवार विदेश से MBBS कराने तक का निर्णय लेते हैं। उन्हें लगता है कि आज चाहे जितना पैसा लग जाए, कल बच्चा डॉक्टर बनकर अच्छी नौकरी करेगा, अच्छी फीस लेगा, अपना क्लिनिक खोलेगा और धीरे-धीरे परिवार द्वारा लगाए गए करोड़ों रुपये वापस आ जाएंगे। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि जब आज का बच्चा MBBS पूरा करके वास्तविक रूप से कमाना शुरू करेगा, तब चिकित्सा का संसार आज जैसा ही रहेगा?
यही वह प्रश्न है जिस पर आज माता-पिता को सबसे गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। हम अपने बच्चे के भविष्य का निर्णय आज के डॉक्टर की फीस और आय देखकर कर रहे हैं, जबकि बच्चे का वास्तविक professional जीवन आने वाले दशक में होगा। तब चिकित्सा क्षेत्र में Artificial Intelligence यानी AI, advanced diagnostics, medical databases, robotics, telemedicine और automated clinical decision-support systems की भूमिका आज की तुलना में बहुत अधिक हो सकती है। लाखों-करोड़ों मरीजों के रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट, CT-MRI, pathology, दवाओं के परिणाम और treatment outcomes का एक साथ विश्लेषण करने वाली प्रणालियां diagnosis और treatment planning में अभूतपूर्व परिवर्तन ला सकती हैं।
कल्पना कीजिए कि किसी बीमारी के लाखों मरीजों का डेटा एक AI system के सामने उपलब्ध हो। उसमें मरीज की उम्र, लक्षण, पुरानी बीमारी, blood reports, imaging, pathology, medicines और treatment response जैसे अनेक filters लगाए जाएं और फिर उन सभी के आधार पर परिणाम निकले। ऐसी technology डॉक्टर को एक विशाल अनुभव-संग्रह कुछ ही क्षणों में उपलब्ध करा सकती है। यह चिकित्सा के क्षेत्र में एक ऐसी क्रांति हो सकती है जिसकी पूरी आर्थिक शक्ति का अनुमान आज लगाना कठिन है। डॉक्टर समाप्त नहीं होगा, लेकिन डॉक्टर के काम करने का तरीका अवश्य बदल सकता है।
सबसे बड़ा प्रभाव संभवतः उन medical tasks पर पड़ेगा जो routine और repetitive हैं। सामान्य रोगों का प्रारंभिक diagnosis, reports की screening, routine follow-up, medical documentation, drug-interaction checks और कई प्रकार के clinical decision-support में AI बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि भविष्य में एक सक्षम डॉक्टर AI की सहायता से आज की तुलना में कई गुना अधिक मरीजों को संभाल सके। तब स्वाभाविक प्रश्न उठेगा—यदि एक डॉक्टर की productivity कई गुना बढ़ गई, तो समान संख्या में मरीजों के लिए भविष्य में उतने ही डॉक्टरों की आवश्यकता क्यों होगी?
यहीं से माता-पिता को आज के सबसे महत्वपूर्ण भ्रम पर विचार करना चाहिए—क्या MBBS की डिग्री अपने आप भविष्य की कमाई की गारंटी है? नहीं। डिग्री एक qualification है, लेकिन उसकी आर्थिक उपयोगिता समय के साथ बदलती रहती है। आज जिस सामान्य MBBS consultation के लिए एक फीस आसानी से मिल जाती है, भविष्य में उसी consultation के लिए AI-based low-cost alternatives और technology-driven healthcare उपलब्ध हो सकते हैं। इससे सामान्य चिकित्सा सेवाओं में competition बढ़ सकता है और consultation fee पर भी दबाव आ सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर डॉक्टर की फीस कम हो जाएगी, लेकिन केवल MBBS की डिग्री के आधार पर पहले जैसी आर्थिक सुरक्षा मान लेना निश्चित रूप से दूरदर्शी सोच नहीं होगी।
अब उस परिवार की कल्पना कीजिए जिसने बच्चे की private MBBS शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च किए। यदि बच्चा डॉक्टर बन गया लेकिन उसे माता-पिता की अपेक्षा के अनुरूप नौकरी नहीं मिली, तो क्या होगा? यदि उसकी income शुरुआती वर्षों में सीमित रही तो करोड़ों रुपये के education investment की भरपाई करने में बहुत समय लग सकता है। और यदि वह नौकरी के बजाय अपना clinic या hospital खोलना चाहे तो समस्या और बड़ी हो सकती है। डिग्री के बाद भी capital की आवश्यकता समाप्त नहीं होती। भवन, उपकरण, diagnostic facilities, trained staff, technology, licensing, maintenance और working capital—इन सभी के लिए बड़ी राशि चाहिए।
इसलिए आज माता-पिता को केवल MBBS की फीस नहीं देखनी चाहिए। उन्हें पूरे career का आर्थिक गणित देखना चाहिए—MBBS की फीस, रहने का खर्च, PG की लागत, training, शुरुआती नौकरी की आय, भविष्य में practice स्थापित करने की लागत और technology में लगातार निवेश। यदि कोई परिवार बड़े स्तर का अत्याधुनिक अस्पताल बनाना चाहता है, तो उसे आने वाले समय में बहुत बड़ी पूंजी की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए आज किसी बच्चे की MBBS पर करोड़ों खर्च करने वाले परिवार को यह भी सोचना चाहिए कि उसके आगे के professional establishment के लिए आवश्यक पूंजी कहां से आएगी।
यहीं वह प्रश्न जन्म लेता है जिसे हम शायद सुनना नहीं चाहते—कहीं ऐसा तो नहीं कि हम बच्चे को कमाने की डिग्री तो दे रहे हैं, लेकिन इतनी महंगी कीमत पर कि वही डिग्री भविष्य में आर्थिक जंजीर बन जाए? बच्चा डॉक्टर होगा, उसके नाम के आगे MBBS लिखा होगा, समाज में सम्मान भी मिलेगा, लेकिन यदि उसकी शिक्षा पर लगी भारी पूंजी का दबाव वर्षों तक उसकी कमाई पर बना रहा तो क्या वह वास्तव में आर्थिक रूप से स्वतंत्र होगा? डिग्री होना और उस डिग्री से पर्याप्त पैसा कमा पाना एक ही बात नहीं है।
विदेश से MBBS कराने वाले माता-पिता को भी इस विषय पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। विदेश की मेडिकल शिक्षा अपने आप में गलत नहीं है और अनेक अच्छे संस्थानों से उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। लेकिन केवल “विदेश से MBBS” शब्द सुनकर भविष्य सुरक्षित मान लेना उचित नहीं है। संस्थान की गुणवत्ता, भारत में डिग्री की मान्यता, licensing requirements, internship, आगे PG की संभावना, कुल खर्च और भारत में practice के वास्तविक अवसर—इन सभी का अध्ययन किए बिना बड़ा आर्थिक निर्णय लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है। विदेश हो या निजी मेडिकल कॉलेज, सवाल डिग्री का नहीं बल्कि उस डिग्री की भविष्य में उपयोगिता और earning potential का है।
इसी प्रकार private MBBS भी गलत नहीं है। यदि बच्चे में डॉक्टर बनने की वास्तविक प्रतिभा और इच्छा है और परिवार आर्थिक रूप से सक्षम है, तो निजी संस्थान एक अच्छा विकल्प हो सकता है। लेकिन यहां भी निर्णय “बच्चा डॉक्टर बनेगा और बहुत पैसा कमाएगा” वाली धारणा पर नहीं होना चाहिए। आज के समय में चिकित्सा क्षेत्र में सफल होने के लिए केवल MBBS पर्याप्त न भी हो सकती है। विशेषज्ञता, clinical experience, research, communication skills और नई technology को अपनाने की क्षमता भविष्य में अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
संभव है आने वाला समय ऐसा हो जिसमें MBBS + विशेषज्ञता + अनुभव + AI वाला डॉक्टर सबसे मजबूत स्थिति में हो। ऐसा डॉक्टर AI को अपना प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि अपनी शक्ति बनाएगा। वह AI से लाखों medical cases का ज्ञान प्राप्त करके अपने clinical judgement को मजबूत कर सकेगा, कम समय में अधिक मरीज देख सकेगा और जटिल मामलों में बेहतर निर्णय ले सकेगा। दूसरी ओर केवल routine काम करने वाला डॉक्टर अधिक competition का सामना कर सकता है।
नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट की सचिव श्रीमती सीमा पाराशर का यह विचार किसी बच्चे को डॉक्टर बनने से रोकने का नहीं है। बल्कि यह माता-पिता से एक ईमानदार संवाद है—अपने बच्चे के भविष्य का निर्णय आज की चमक देखकर मत कीजिए। बच्चे की रुचि क्या है? उसकी प्रतिभा किस क्षेत्र में है? वह चिकित्सा की कठिन पढ़ाई और लंबे training period के लिए तैयार है या नहीं? परिवार जितना पैसा लगा रहा है, क्या वह आर्थिक रूप से सुरक्षित रहेगा? यदि भविष्य में सामान्य medical practice पर technology का दबाव बढ़ा तो बच्चा स्वयं को किस तरह अलग स्थापित करेगा? क्या वह PG करेगा? क्या वह AI और modern technology सीखने के लिए तैयार है? इन प्रश्नों के उत्तर जानना आज उतना ही आवश्यक है जितना MBBS में admission लेना।
और यदि किसी बच्चे की प्रतिभा चिकित्सा से अधिक technology, AI, engineering, research, entrepreneurship या किसी अन्य क्षेत्र में है, तो केवल डॉक्टर की सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण करोड़ों रुपये उसी दिशा में लगाना आवश्यक नहीं। कभी-कभी बच्चे को महंगी डिग्री देने से बेहतर होता है उसकी वास्तविक प्रतिभा में निवेश करना। संभव है कि वही पैसा किसी दूसरे क्षेत्र में कम लागत पर ऐसी क्षमता पैदा करे जिससे बच्चा भविष्य में अधिक आय, स्वतंत्रता और संतोष प्राप्त कर सके।
आज माता-पिता के सामने सबसे बड़ा निर्णय यह नहीं है कि “MBBS कराएं या नहीं?” बल्कि यह है कि “किस कीमत पर MBBS कराएं और बच्चे के भविष्य की आर्थिक वास्तविकता क्या होगी?” यदि सरकारी मेडिकल कॉलेज में कम लागत पर अच्छी शिक्षा का अवसर मिलता है, तो परिस्थिति अलग है। लेकिन यदि निजी या विदेशी MBBS के लिए परिवार को अपनी जीवनभर की जमा पूंजी, संपत्ति या भारी ऋण का सहारा लेना पड़े, तो निर्णय को केवल भावनाओं से नहीं बल्कि भविष्य के आर्थिक गणित से देखना चाहिए।
आज की तारीख में डॉक्टर की फीस देखकर कल की कमाई तय करना वैसा ही है जैसे आज की तकनीक देखकर अगले पंद्रह वर्षों का संसार तय कर देना। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। AI केवल चिकित्सा ही नहीं, बल्कि लगभग हर profession के काम करने के तरीके को बदल रहा है। इसलिए बच्चों को केवल degree-holder बनाने के बजाय future-ready professional बनाना ही सबसे बड़ा निवेश है।
नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से माता-पिता से मेरा विनम्र आग्रह है—बच्चे को डॉक्टर बनाइए तो उसकी प्रतिभा और इच्छा देखकर, केवल समाज की प्रतिष्ठा और आज की डॉक्टर की कमाई देखकर नहीं। निजी या विदेशी MBBS पर करोड़ों रुपये खर्च करने से पहले यह जरूर सोचिए कि कल वही बच्चा उस निवेश को वापस पाने में कितना समय लगाएगा और बदलती चिकित्सा व्यवस्था में उसके सामने कितने नए अवसर और कितनी नई चुनौतियां होंगी।
कहीं ऐसा न हो कि आज हम बच्चे के हाथ में सम्मान की डिग्री देकर यह समझ लें कि उसका भविष्य सुरक्षित हो गया, लेकिन कल वही डिग्री आर्थिक स्वतंत्रता देने के बजाय भारी निवेश की जंजीर बन जाए।
समय की मांग है—बच्चे के भविष्य में पैसा नहीं, विवेक लगाइए; केवल डिग्री नहीं, क्षमता दीजिए; केवल नौकरी नहीं, अवसर पैदा करने की योग्यता दीजिए। क्योंकि आने वाला समय उसी का होगा जो बदलती तकनीक से डरने के बजाय उसे अपनी शक्ति बना लेगा।
— श्रीमती सीमा पाराशर
सचिव, नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट, अजमेर
14/09/2026
गणेश विसर्जन—परंपरा नहीं, जीवन का सनातन संदेश
भारतीय सनातन परंपरा में गणेश चतुर्थी के दिन मिट्टी (मृदा) से निर्मित श्रीगणेश प्रतिमा की स्थापना करने और 10 दिन अर्थात अनंत चतुर्दशी के पश्चात उन्हें जल में विसर्जित करने के पीछे पौराणिक, शास्त्रीय एवं दार्शनिक तीन मुख्य आधार हैं। यह परंपरा केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि इसके भीतर मनुष्य के जीवन, प्रकृति, संबंधों और नश्वरता का गहरा संदेश छिपा हुआ है। महाभारत के लेखन कार्य से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना के लिए भगवान श्रीगणेश से इसे लिखने का अनुरोध किया। गणेश जी ने शर्त रखी कि व्यास जी बिना रुके बोलेंगे और वे बिना रुके लिखेंगे। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से प्रारंभ हुआ यह कार्य निरंतर दस दिनों तक चला। लगातार लेखन के कारण गणेश जी के शरीर का ताप बढ़ गया। उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए वेदव्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित मिट्टी का लेप किया। अनंत चतुर्दशी के दिन लेखन पूर्ण होने पर उन्हें जल में स्नान कराया गया, जिससे शरीर का ताप शांत हुआ। इसी पौराणिक प्रसंग से मिट्टी की प्रतिमा की स्थापना और दसवें दिन विसर्जन की परंपरा को जोड़ा जाता है।
शास्त्रों में पार्थिव पूजा अर्थात मिट्टी से निर्मित प्रतिमा की पूजा का विधान मिलता है। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में पार्थिव प्रतिमा में मंत्रोच्चार द्वारा देवत्व का आवाहन और पूजा-विधान बताया गया है। मिट्टी की प्रतिमा क्षरणशील होती है, इसलिए निश्चित पूजा-अवधि के बाद उसका सम्मानपूर्वक विसर्जन किया जाता है। शिव पुराण में भी माता पार्वती द्वारा अपने शरीर के उबटन से गणेश जी की आकृति बनाकर उसमें प्राण स्थापित करने का प्रसंग मिलता है। अर्थात मिट्टी से स्वरूप का निर्माण और पुनः प्रकृति में उसका विलय सनातन चिंतन में एक गहरे प्रतीक के रूप में दिखाई देता है।
भारतीय दर्शन पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—की बात करता है। मिट्टी से गणेश जी की प्रतिमा का निर्माण सृष्टि का प्रतीक है और जल में उसका विलीन होना विलय का। यह हमें जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझाता है कि जो आकार लेता है, उसका एक दिन निराकार होना निश्चित है। शरीर हो, धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो या संसार का कोई संबंध—कुछ भी स्थायी नहीं है। ईश्वर के स्वरूप को घर लाना श्रद्धा है और उसी ईश्वर-स्वरूप को सम्मानपूर्वक विदा करना अनासक्ति की शिक्षा है। प्राचीन काल में गणेश प्रतिमाएँ प्राकृतिक मिट्टी तथा हल्दी, चंदन, रोली, दुर्वा आदि पारंपरिक सामग्री से बनाई जाती थीं। वर्षा ऋतु के बाद जलस्रोतों में जल का संचार होता था और मिट्टी की प्रतिमा का जल में विलय प्रकृति के चक्र का ही एक हिस्सा था। इस परंपरा का मूल स्वरूप प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाला था। आज हमें इसी भावना को समझते हुए पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी की प्रतिमाओं और प्राकृतिक सामग्री के उपयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अब प्रश्न यह है कि गणेश जी के विसर्जन से आज का मनुष्य क्या सीखे? हम गणेश जी को दस दिनों तक अपने घर में रखते हैं, उन्हें अपना मानते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनसे सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं और फिर उसी श्रद्धा से उन्हें विदा कर देते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि जिस विसर्जन को हम प्रतिमा के लिए करते हैं, उसका एक विसर्जन हमारे भीतर भी होना चाहिए? आज परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव है। पति-पत्नी अपेक्षाओं के बोझ से परेशान हैं, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम हो रहा है, भाई-बहनों के बीच संपत्ति और स्वार्थ दीवारें खड़ी कर रहे हैं और मित्रता में भी गलतफहमियाँ रिश्तों को कमजोर कर रही हैं। हम गणेश जी की प्रतिमा को तो जल में विसर्जित कर देते हैं, लेकिन अपने मन का अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, पूर्वाग्रह और वर्षों पुरानी नाराज़गी विसर्जित नहीं कर पाते।
इसी भावना को ध्यान में रखते हुए गणेश मूर्ति स्थापित करने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए यह एक पवित्र संदेश और संकल्प है—गणेश जी की स्थापना के साथ हम अपने जीवन में एक नई, मंगलमयी परंपरा का शुभारंभ करें। जिस श्रद्धा से हम गणपति बप्पा को अपने घर और हृदय में स्थान देते हैं, उसी श्रद्धा से उनके विसर्जन के समय अपने भीतर के दुर्गुणों का भी विसर्जन करें। हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष, विद्वेष, आपसी रंजिश, कटुता या कोई पुराना विवाद है, तो इस बार उन भावनाओं को भी गणेश जी के चरणों में समर्पित कर दें। प्रतिमा के साथ अपने अहंकार, क्रोध और मन की गांठों को भी विदा करें, ताकि विसर्जन के बाद हमारा हृदय हल्का, निर्मल और प्रेम से भरा हो सके। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संबंधों को पुनः जोड़ने, क्षमा मांगने, क्षमा करने और प्रेम का दीप जलाने का अवसर बने।
यही गणेश विसर्जन हमें स्वयं से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है—क्या इस बार केवल गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन होगा या हमारे भीतर बैठा कोई अहंकार भी विसर्जित होगा? यदि परिवार में किसी से मनमुटाव है तो संवाद कीजिए। यदि किसी के व्यवहार से चोट लगी है तो क्षमा का मार्ग खोजिए। यदि किसी के बारे में बिना पूरी सच्चाई जाने धारणा बना ली है तो उस धारणा को सत्य मानने से पहले बात कीजिए। यदि धन, पद या प्रतिष्ठा ने रिश्तों में दूरी पैदा कर दी है तो याद रखिए—अंत में मिट्टी ही शरीर को ग्रहण करती है; साथ जाता है तो केवल हमारा कर्म और हमारे द्वारा दिया गया प्रेम। गणेश जी की स्थापना हमें बताती है कि जीवन में श्रद्धा से किसी को स्थान देना चाहिए और विसर्जन हमें सिखाता है कि मोह को प्रेम मत समझिए। प्रेम में सम्मान होता है, विश्वास होता है, स्वतंत्रता होती है और आवश्यकता पड़ने पर छोड़ देने का साहस भी होता है।
आज आवश्यकता है कि गणेश चतुर्थी केवल सजावट, उत्सव और विसर्जन तक सीमित न रहे। यह हमारे लिए आत्ममंथन का पर्व बने। हम अपने घर में गणेश जी की स्थापना के साथ अपने भीतर सद्बुद्धि की स्थापना करें और विसर्जन के समय अपने भीतर से उन विचारों का विसर्जन करें जो परिवार, मित्रता और समाज में दूरी पैदा करते हैं। यदि इस गणेश चतुर्थी पर कोई परिवार अपनी पुरानी नाराज़गी समाप्त कर दे, दो मित्र संवाद करके अपनी गलतफहमी दूर कर लें, कोई संतान अपने माता-पिता को समझने का प्रयास करे और कोई व्यक्ति अपने अहंकार को त्याग दे, तो यही श्रीगणेश की सच्ची आराधना होगी।
गणेश स्थापना आह्वान है—ईश्वर का हमारे घर और हृदय में आगमन; गणेश विसर्जन पुनरागमन है—उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करना। मिट्टी से जल तक की यह यात्रा हमें बताती है कि सृष्टि होती है, स्वरूप बनता है और अंततः प्रकृति में विलीन हो जाता है। इसलिए इस गणेश चतुर्थी पर केवल यह संकल्प न लें कि अगले वर्ष गणेश जी फिर आएँगे, बल्कि यह भी संकल्प लें कि अगले वर्ष तक हमारे भीतर का क्रोध थोड़ा कम होगा, अहंकार थोड़ा छोटा होगा, रिश्तों में संवाद थोड़ा अधिक होगा और हमारे घर में प्रेम थोड़ा और बढ़ेगा। क्योंकि सच्चा गणेश विसर्जन केवल प्रतिमा का जल में विलय नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के अवगुणों का विसर्जन है। गणपति बप्पा मोरया—अगले वर्ष तू जल्दी आ, और जाते-जाते हमारे भीतर से अहंकार, द्वेष और कटुता भी ले जा।
11/09/2026
चिड़चिड़ापन
जब विचार हमारे व्यवहार पर अधिकार कर लेते हैं
अक्सर हम समझते हैं कि हमारा चिड़चिड़ापन परिस्थितियों के कारण है, जबकि कई बार परिस्थितियाँ उतनी कठिन नहीं होतीं, जितनी कठिन हमारे मन में बनाई गई उनकी कहानी होती है। मन में एक विचार आता है—हम उसे जाँचते नहीं, बल्कि बार-बार सोचते हैं। फिर वही विचार चिंता बनता है, चिंता आशंका बनती है, आशंका कल्पना बनती है और कल्पना धीरे-धीरे हमें सत्य जैसी लगने लगती है। यही क्रम आगे चलकर विचार → चिंता → आशंका → कल्पना → विश्वास → चिड़चिड़ापन → व्यवहार परिवर्तन बन जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम कई बार उस बात पर भी दुखी और क्रोधित हो जाते हैं, जो अभी हुई ही नहीं। बच्चा परीक्षा में अच्छे अंक नहीं लाया तो मन कहता है—“अब समाज और आस-पड़ोस मेरा मजाक बनाएगा।” बच्चा खेल में प्रथम नहीं आया तो लगता है—“लोग क्या कहेंगे?” जबकि बच्चे का परिणाम केवल उसके जीवन की एक छोटी-सी सीढ़ी है, हमारे सम्मान का प्रमाणपत्र नहीं। फिर हमारी चिंता बच्चे पर उतरती है, हमारी आवाज कठोर होती है और जिसे हमें सहारा देना चाहिए, उसी का मन हम अपनी आशंकाओं से चोटिल कर देते हैं।
रिश्तों में भी यही होता है। बच्चे का विवाह संबंध अभी तय नहीं हुआ तो मन में विचार आता है—“समाज क्या सोचेगा, मेरी हँसी उड़ जाएगी।” कोई मित्र हमारी भलाई के लिए कोई समझ की बात कहता है तो वही बात हमें विरोध जैसी लगने लगती है। हम मित्र के शब्द नहीं सुनते, अपने मन में चल रही कहानी सुनते हैं। धीरे-धीरे विश्वास बदलता है, नजरिया बदलता है और फिर व्यवहार बदल जाता है। कई अच्छे रिश्ते किसी वास्तविक गलती से नहीं, बल्कि मन में पैदा हुई गलतफहमी को बार-बार शक्ति देने से टूटते हैं।
धर्म और ईश्वर के मामले में तो यह और भी मार्मिक है। कभी हम सोचते हैं—“मैं मंदिर जाकर ठीक से प्रार्थना नहीं कर पाया, लोग क्या कहेंगे?” किसी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम में कोई कमी रह गई तो लगता है कि लोग हमारी हँसी उड़ाएँगे। हम भूल जाते हैं कि ईश्वर हमारे प्रदर्शन को नहीं, हमारे भाव को देखते हैं। मंदिर में आँखें बंद करके भी यदि मन लोगों की कल्पित हँसी से डर रहा है तो हमने मंदिर में जाकर भी अपनी शांति बाहर के लोगों के हाथ सौंप दी। जिस समाज के बारे में हम इतना सोचते हैं, वह कुछ क्षण बाद अपनी ही जिंदगी में व्यस्त हो जाता है; लेकिन हम उसकी कल्पित बातों को अपने मन में लेकर घंटों परेशान होते रहते हैं।
इसी प्रकार घर का खर्च, परिवार की जिम्मेदारी और रिश्तेदारों का आना-जाना भी अपने आप में परेशानी नहीं हैं। परेशानी तब बढ़ती है जब मन कहता है—“सब कुछ मेरे ऊपर ही क्यों है?” और हम उसी विचार को बार-बार दोहराकर स्वयं को पीड़ा देते हैं। जबकि वही परिस्थिति दूसरी दृष्टि से देखें तो—खर्च उठाने का अर्थ है कि हमारे पास कमाने का साधन है, परिवार की जिम्मेदारी का अर्थ है कि हमारे पास अपना परिवार है और रिश्तेदारों का आना-जाना बताता है कि जीवन में रिश्ते और अपनेपन की जगह अभी जीवित है।
इसलिए जीवन में सबसे पहले परिस्थितियों को नहीं, अपने विचारों को पकड़ना सीखिए। मन में कोई नकारात्मक विचार आए तो तुरंत उसे सच मत मानिए। स्वयं से पूछिए—“क्या यह तथ्य है या मेरी आशंका? क्या वास्तव में किसी ने ऐसा कहा है, या मैं केवल कल्पना कर रहा हूँ? क्या मैं एक छोटी-सी बात को बार-बार सोचकर बहुत बड़ा बना रहा हूँ?”
क्योंकि हर विचार सत्य नहीं होता, हर आशंका भविष्यवाणी नहीं होती और हर कल्पना वास्तविकता नहीं होती। लेकिन जिस विचार को हम बार-बार सोचते हैं, भावनाएँ देते हैं और विश्वास करने लगते हैं, वह हमारे व्यवहार को प्रभावित करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।
जरा अपने भीतर झाँककर देखिए—कहीं हम अपने ही विचारों के कारण तो अपने बच्चों से दूर नहीं हो रहे? कहीं “लोग क्या कहेंगे” के डर से अपने रिश्तों की मिठास तो नहीं खो रहे? कहीं दूसरों की कल्पित हँसी के डर से अपनी आत्मा की शांति तो नहीं बेच रहे?
जीवन बहुत छोटा है। इसे उन बातों पर मत गँवाइए, जो हुई ही नहीं।
अपने मन को समझाइए—
“लोग क्या कहेंगे, यह उनके अधिकार में है; मैं कैसे सोचूँगा और कैसे व्यवहार करूँगा, यह मेरे हाथ में है।”
दृष्टि बदलने का अर्थ समस्याओं से भागना नहीं है। इसका अर्थ है—उसी परिस्थिति को एक नई आँख से देखना। जब दृष्टि बदलती है तो परिस्थिति भले वही रहे, लेकिन मनुष्य बदल जाता है; और जब मनुष्य बदलता है तो उसका परिवार, उसके रिश्ते और उसका पूरा जीवन बदलने लगता है।
चिड़चिड़ापन कई बार बाहर की दुनिया की देन नहीं, भीतर पाले गए विचारों की परछाई होता है। इसलिए विचारों को शक्ति देने से पहले उन्हें परखिए—कहीं आपका मन ही आपको आपके अपनों से दूर तो नहीं कर रहा?
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Website
Address
Plot No 22 And 25 Shubhan Colony Behind Secret Heart School Kayar Ajmer
Ajmer